“हर सपने को अपनी सांसो में रखो ,
हर मंजिल को अपनी बाहों में रखो।
हर जीत आपकी है, ए – दोस्त ,
बस अपने लक्ष्य को अपनी निगाहों में रखो। “
जी हां , आज हम आप का परिचय करवाएंगे एक ऐसी शख़्सियत से , जिसके सफ़र की शुरुवात ने ही उसके सपनो को परिस्थितियों का हवाला देते हुए आँखो में पल रहे चमक भरे सपने को पल – भर में ही तोड़ दिया। पर कहते है ना ” “मंजिल मिल ही जाएगी भटकते ही सही , गुमराह तो वह है जो घर से निकलते ही नहीं ” इसी बात को अपने व्यक्तित्व में समेटे हुए उन्होंने मुकाम हासिल किया जो आज भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में एक मिसाल , एक प्रेरणा , एक उम्मीद के रूप में वह काफी शोहरत बटोर चुका है।
जी हाँ , हम बात कर रहे है प्रदीप सिहाग की जिन्हे भारत ही नहीं बल्कि ऑस्टेलिया में बॉक्सर के रूप में ” द इंडियन वॉरियर्स ” पहचान मिली है। उनकी यह पहचान आज हम लोगो के सामने एक योद्धा के रूप में सामने है।
प्रदीप 75 वर्ग किलोग्राम वजन की कैटिगिरी में दुनिया के 10 टॉपर्स में शामिल है। पर प्रोफेशनल बॉक्सिंग की उन्हें यह कामयाबी भारत में नहीं बल्कि आस्ट्रेलिया में मिली। भारत में तो उनका करियर 10 साल पहले ही ख़त्म हो गया था। उसकी सिर्फ़ एक ही वजह थी की उनका आँखो का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो रखा था। लेकिन फिर भी उन्होंने अपने बॉक्सिंग के सपने को टूटने नहीं दिया। और अपनी निरंतर मेहनत , लगन और दृढ़ इच्छा शक्ति से अपनी विश्व में एक अलग पहचान बनाई। आज ऑस्ट्रेलिया में प्रदीप सिहाग को बॉक्सर के रूप में ” द इंडियन वॉरियर्स ” के नाम से जाना जाता है।
प्रदीप सिहाग के इस सफर की शुरुवात और सफलता के पीछे के कुछ अनुभवों या परिस्थितियों पर नजर डाले तो उसमें एक बेहद ही भ्रष्ट और भेदभाव पूर्ण राजनीति की बू आती है जो एक बेहद ही काबिल इंसान को उसके सपनों से दूर कर देती है। पर प्रदीप सिहाग ने अपने मेहनत से इस भ्रष्ट और भेदभाव पूर्ण संगठनों को मुँह तोड़ जवाब दिया है।
2004 में प्रदीप भारतीय यूथ कॉमनवेल्थ टीम का हिस्सा थे। टीम आस्ट्रेलिया जाने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पहुंची। ऐन वक्त पर बॉक्सिंग फेडरेशन टीम की तरफ से फरमान आया कि प्रदीप टीम के साथ नहीं जाएंगे। क्योकि उन्होंने आँख में मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवा रखा है। बॉक्सिंग के नियमों मुताबिक़ , आँख के ऑपरेशन करने वाले मुक्केबाज़ बॉक्सिंग नहीं कर सकते है। प्रदीप बताते है की मैंने उसी समय बैग उठाया लौट आया। लेकिन मै पूरी रात सो न पाया। दिमाग में एक ही बात बार बार घूमती रही की मै बॉक्सिंग क्यों नहीं कर सकता।
बस फिर क्या था वीजा मेरे पास था ही अपने सपनो को उड़ान देने के लिए मैंने 5 दिन बाद मेलबर्न की फ्लाइट पकड़ ली। प्रदीप मेलबर्न तो पहुँच गए पर उन्हें यह नहीं पता था की अपनी बॉक्सिंग करियर को कैसे आगे बढ़ाए। उन्हें ठीक से अंग्रेजी बोलना भी नहीं आता था। एक दिन सड़क किनारे प्रदीप की नजर एक बोर्ड पर पड़ी जो जिम कम और बॉक्सिंग सेंटर ज्यादा था। वह अंदर गए और जिम कोच मरे थॉमसन बातचीत की।
कोच ने प्रदीप से पूछा क्या काम है ? प्रदीप ने टूटे फूटे शब्दों में अपनी बात कही की मुझे बॉक्सिंग करनी है। कोच ने एक बॉक्सर को इशारा किया। बॉक्सिंग बाउट हुई। प्रदीप के पंच और स्किल से टॉमसन बहुत प्रभावित हुए। यही से उनका प्रोफेशनल बॉक्सर बनने का सफर शुरू हो गया। थॉमसन ने कहा की प्रोफेशनल बॉक्सिंग में आँख की सर्जरी कोई मायने नहीं रखती।
2006 में प्रदीप ” द इंडियन वॉरियर्स “आस्ट्रेलिया में अपने वर्ग में बेस्ट बॉक्सर का खिताब हासिल कर सबकी नजरो में आ गए। देखते ही देखते उन्हें एशियन मिडिल वेट , पैन बॉक्सिंग और ओ पी बीए जैसे टाइटल भी अपने नाम किए।
अंत में प्रेणना की दो पक्तियां से प्रदीप सिहाग के जज़्बे और दृढ़ संकल्प को सलाम करती है ।
“जिनमे अकेले चलने के हौसले होते है ,
एक दिन उनके पीछे काफ़िले होते है । “
- दीपा दत्ता Playonidnia TV


