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मजदूर की बेटी का एक पंच…देख दुनिया हुई दंग।

 

मैरी कॉम.. एक नाम जो जब भी कहीं लिखा गया, सुना गया, वो सिर्फ एक नाम नहीं रहा…उसमें अहसास शामिल रहा संघर्ष का,जुनून का और बहाने छोड़ कर कुछ कर गुजरने की प्रेरणा का। वो सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं बल्कि जीती जागती मिसाल हैं एक हिंदुस्तानी औरत की सादगी और सफलता की। तो आइए मैरी कॉम को समझते हैं उन्हीं की जुबान से निकले शब्दों की गवाही के जरिए।


मैरी कॉम कहती हैं कि उनके लहु में फाइटिंग का कतरा कुछ ज्यादा है, जिंदगी की मुश्किलों ने जब भी उनको आजमाया, ये उनकी रगों में दौड़ने वाले लहू की रफ्तार दुगनी होती चली गई। मैरी कॉम का पंच जब भी कहीं पड़ता है, अपना निशान छोड़ देता है, जब वो प्रैक्टिस करती हैं तो पंचिग किट भी मुस्कुराकर लहराने लगता है। मैरी कॉम का ध्यान भटकता नहीं है वो पूरी तरह से फोकस रहती हैं।


मैरी को बचपन से खेलना कूदना बहुत पसंद था …गांव में फूटबॉल खेला तो जाता था, लेकिन उसमें खेलने वाले सिर्फ लड़के होते थे…मैरी ने जिद की और खेलने के लिए लड़ी भी,…इस छोटी सी लड़ाई ने मैरी के अंदर एक आत्मविश्वास जगा दिया। फूटबॉल खेलती रही मैरी की किक काफी मजबूत हो चुकी थी…पैरों से चलकर मंजिल तक का रास्ता कुछ बनने लगा था। लेकिन फिर एक दिन वो आया जब मैरी का मन किक छोड़कर पंच पर भरोसा करने का हुआ।

टीवी पर मोहम्मद अली का एक मैच देखा तो प्रेरणा का ज्वार मैरी के सिर चढ़ कर बोलने लगा। मोहम्मद अली भी एक गरीब परिवार से थे…उनका भी कोई गॉडफादर नहीं था और ना ही किस्मत का कोई शेहरा सिर पर था …सिर्फ मेहनत से उन्होनें नाम शौहरत कमाई थी…मैरी की गरीबी ने बॉक्सिंग की इजाजत दी और मणिपुर के प्रसिद्द बॉक्सर डिकों सिंह के खेल से सीखकर अपना हुनर बढ़ाने लगी।

 

मैरी ने 15 साल की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की,क्योंकि वो छोटी और हल्की थीं, दूसरे छात्र उन्हें आसानी से हरा देते थे। चेहरे पर चोट के निशान पड़ते जाते लेकिन हौंसला बढ़ता जाता मैरी का मानना है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं था…विरोधी उन्हें मैट पर गिरा सकता है लेकिन वो ज्यादा देर गिराए नहीं रख सकते थे क्यों कि उठकर उन्हें लड़ना है। मैरी की लंबाई पांच फ़ीट दो इंच है और उनका वज़न करीब 48 किलो है। ये सोचना कितना मुश्किल लगता है ना कि इतनी कम लंबाई और दुबले-पतले शरीर वाली एक चैम्पियन हो सकती है? अक्सर लोग सोचते हैं कि बॉक्सिंग चैम्पियन की आंखों में माइक टायसन जैसा गुस्सा होना चाहिए और उसकी बॉडी लैंग्वेज मोहम्मद अली जैसी होनी चाहिए।


लेकिन मैरी जब रिंग में होती हैं तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती है। लेकिन मुस्कान का मतलब ये नहीं है कि उनके दिमाग में कुछ और चल रहा है ..वो अपने खेल में बहुत तेज़ और केंद्रित भी रहती हैं। मैरी का कहना है कि आपका परिवार आपके साथी आपका कोच आपको एक हद तक स्पोर्ट कर सकते हैं…लेकिन रिंग में आपको अकेले ही उतरना है।
साल 2000 में राज्य मुक्केबाज़ी की प्रतिस्पर्धा जीतने के बाद मैरी को लगा कि बॉक्सिंग करने का उसका फैसला गतल नहीं है । इसके बाद मैरी ने मुड़कर नहीं देखा, अब वो अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के लिए तैयार हो चुकी थीं।

दो घंटे की बॉक्सिंग प्रैक्टिस काफी होती है, लेकिन अनुशासन के साथ सही खान पान भी जरुरी होता है। वो घर का बना मणिपुरी खाना खाती हैं. उबली सब्ज़ियों और मछली के साथ प्रोटीन से भरे चावल उनके खाने का हिस्सा रहता है।


मैरी अपने लिए ख़ुद फ़ैसले लेती हैं, वो अपने मूड के हिसाब से प्रैक्टिस का वक्त तय करती हैं. वो कहती हैं कि 37 साल की उम्र में जीतने के लिए ऐसे बदलाव करने ज़रूरी हैं।
वो कहती हैं, “आज की मैरी और 2012 से पहले की मैरी में अंतर है। युवा मैरी एक के बाद एक लगातार पंच मारती थी। अब मैरी हमला करने के लिए सही वक्त का इंतज़ार करती है और इस तरह अपनी ऊर्जा बचाती हैं।”


वो अकेली महिला हैं जो रिकॉर्ड छह बार वर्ल्ड एमेच्योर बॉक्सिंग चैंपियन रही हैं, इसके अलावा वो अकेली बॉक्सर हैं जिन्होंने पहली सात विश्व चैम्पियनशिप में हर बार एक मेडल जीता है और अकेली बॉक्सर हैं..महिला या पुरुष सबमें से जिन्होंने आठ विश्व चैम्पियनशिप मेडल जीते हैं।

मैरी कॉम को ऑनलर के रूप में एक बहुत ही समझदार जीवन साथी मिला, दोनों ने 2005 में शादी की थी,दो साल बाद, मैरी ने अपने जुड़वा बेटों को जन्म दिया।ऑनलर ने घर में बच्चों को संभाला और मैरी ने वापस अपनी ट्रेनिंग शुरू की,वो जब दोबारा रिंग में उतरी तो उन्होंने 2008 में अपना लगातार चौथा विश्व चैंपियनशिप गोल्ड जीता। जिंदगी की मुश्किलों को बहाना नहीं बल्कि मैरी ने अवसर की तरह अपनाया..रिंग की तरह जिंदगी में भी गिर कर फिर उठी मुश्किलों पर मजबूती से प्रहार कर खुद को विजेता साबित करती रही।

साल 2020 में मैरी कॉम को प्रतिष्ठित पद्म विभूषण अवॉर्ड के लिए चुना गया है।पहली बार खेल मंत्रालय ने किसी महिला एथलीट का नाम इस अवॉर्ड के लिए आगे किया है। पद्म विभूषण, भारत रत्न के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। 25 अप्रैल 2016 में भारत के राष्ट्रपति ने मैरी कॉम को राज्य सभा के सदस्य के तौर पर मनोनीत किया था। मैरी कॉम ने अपनी ग़रीबी को मात दी और चुनौतियों से लड़कर ओलंपिक तक का रास्ता बनाया,आज भी तीन बच्चों की मां मैरी कॉम अपने सपनों के लिए लड़ रही हैं।


अब उनकी नज़र 2020 के टोक्यो ओलंपिक पर है, जहां वो अपना सातवां विश्व चैंपियनशिप टाइटल जीतना चाहती हैं…जिसके पास हिम्मत और हौंसलों के पंख हों भला उसकी परवाज क्या पैमाना हो सकता है। हिंदुस्तान की एक ऐसी बेटी जिस पर पूरी दुनिया गर्व करती है जो हर बेटी के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।

Written by Deepak Chauhan

Deepak Chauhan is a journalist who expertise is writing digital News on Sports & Political , inspirational stories , having 5+ Year experience as a News Article writer,

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