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पी.वी.संधू

चलता रहूँगा पथ पर,
चलने में माहिर बन जाऊंगा !!
या तो मंजिल मिल जाएगी,
या अच्छा मुसाफ़िर बन जाऊंगा !!

जी हां , अगर आप में से या हम में से कोई भी व्यक्ति अपना कोई लक्ष्य रखता है और उसको पूरा करने की चाह भी रखता है तो फर्क इस बात से नहीं पड़ता की वह जीतता है या हारता है। फर्क पड़ता है की वह क्या सीखता है। अगर हमें मंजिल न मिले पर हम मंजिल में मिले अनुभवों से अपने आने वाले जीवन को आसानी से काट सकते है। पर हम में से कुछ विरले ही लोग होते है जो न केवल अच्छे मुसाफिर बनते है बल्कि अपनी मंजिल को भी हासिल करते है। उसी कतार में एक बहु चर्चित नाम है पी. वी सिंधु का।

जिन्होंने बैंडमिंटन के खेल में भारत में इतिहास रच दिया। आज वो लाखो लड़कियों के लिए एक मिसाल बानी हुई है। उन्होंने इस मुकाम की शुरुवात बचपन से ही कर दी थी। आज हम पी. वी सिंधु के जीवन की सफलता की कहानी आपको बतलायेंगे।
पुर्सला वेंकटा सिन्धु एक भारतीय प्रोफेशनल बैडमिंटन खिलाडी है। 2016 के समर ओलंपिक्स में ओलंपिक्स सिल्वर मेडल जीतने वाली वह पहली महिला भारतीय बैडमिंटन खिलाडी बनी। जो ओलंपिक्स फाइनल तक पहुंची। और ओलंपिक्स के एकल में बैडमिंटन में सिल्वर जीतने वाली वह सबसे कम उम्र की खिलाडी है।

पुरसला वेंकटा सिन्धु का जन्म एक तेलगु परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पी.वी. रमण और माता का नाम पी. विजया था –दोनों ही माजी वॉलीबॉल खिलाडी थे। 2000 में रमण को अपने खेल के लिये अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।

जब सिन्धु के माता-पिता प्रोफेशनल वॉलीबॉल खेल रहे थे तभी सिन्धु ने बैडमिंटन खेलने का निर्णय लिया और अपनी सफलता की प्रेरणा सिन्धु ने 2001 में ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियन में पुल्लेला गोपीचंद से ली। असल में सिन्धु ने 8 साल की उम्र से ही बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था।

2013 मे बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप का मेडल जीतने वाली वह पहली महिला एकल खिलाडी बन चुकी थी। मार्च 2015 में वह भारत के चौथे सर्वोच्च पुरस्कार पद्म श्री को पाने वाली वह सबसे कम उम्र की भारतीय महिला बन गयी थी। जुलाई 2013 से सिन्धु भारत पेट्रोलियम में कार्यरत है। भारत पेट्रोलियम के हैदराबाद ऑफिस में वह असिस्टेंट मेनेजर के पद पर कार्यरत है। रिओ ओलिंपिक में सिल्वर मेडल जीतने के बाद उनका प्रमोशन कर उन्हें डिप्टी स्पोर्ट मेनेजर बनाया गया।

पी. व्ही. सिन्धु के घर से उनके प्रशिक्षण लेने की जगह तक़रीबन 56 किलोमीटर दूर थी, लेकिन यह उनकी अपार इच्छा और जीतने की चाह ही थी जिसके लिये उन्होंने कठिन परिश्रम किया था। अपने कठिन परिश्रम की बदौलत ही आज वह एक सफल बैडमिंटन खिलाडी बन पाई।गोपीचंद ने भी सिन्धु की तारीफ में कहा था की सिन्धु के खेल में उसकी सबसे अच्छी बात उसका

रवैया है वह आखिरी दम तक अपने खेल को नही छोडती और हार नही मानती। गोपीचंद की बैडमिंटन अकैडमी में शामिल होने के बाद सिन्धु ने कई टाइटल्स जीते। अंडर-10 इयर केटेगरी में सिन्धु में पाँचवी सर्वो ऑल इंडिया रैंकिंग चैंपियनशिप युगल केटेगरी में जीती थी और एकल केटेगरी में अम्बुजा सीमेंट ऑल इंडिया रैंकिंग का टाइटल अर्जित किया था।

अंडर-13 इयर केटेगरी में सिन्धु में पांडिचेरी की सब-जूनियर चैंपियनशिप में सिंगल का टाइटल अर्जित किया था। इसके साथ ही सिन्धु ने कृष्णा खेतान ऑल इंडिया टूर्नामेंट, IOC ऑल इंडिया रैंकिंग, सब-जूनियर नेशनल और पुणे में ऑल इंडिया रैंकिंग के कई टाइटल्स भी अर्जित किये है।  भारत में सिन्धु ने 51 वे नेशनल स्कूल गेम्स में अंडर-14 केटेगरी में गोल्ड मेडल भी जीता था।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सिन्धु ने 2009 में कोलंबो में सब-जूनियर एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप में ब्रोंज मेडल भी जीता था। 2010 ईरान फजर इंटरनेशनल बैडमिंटन चैलेंज में सिन्धु ने सिंगल केटेगरी में सिल्वर मेडल जीता। 2010 में मेक्सिको में जूनियर वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में सिन्धु क्वार्टरफाइनल तक पहुची थी। इसके साथ ही वह 2010 में उबेर कप की भारतीय नेशनल टीम की सदस्य भी थी।

रिओ ओलंपिक्स 2016 में विमेंस सिंगल इवेंट में सिन्धु हंगेरियन लौरा सरोसी और कैनेडियन मिशेल ली के साथ ग्रुप मैच में नौवे स्थान पर काबिज रही। उन्होंने लौरा और मिशेल को क्रमशः 2-0 और 2-1 से अपसेट किया था। बाद में प्री-क्वार्टरफाइनल में सिन्धु ने तायपेई ताई तजु-यिंग को 2-0 से पराजित किया और फिर क्वार्टरफाइनल में उनका सामना वर्ल्ड नं. 2 चायनीज वांग ईहाँ से हुआ था जिसमे उन्होंने उसे 2-0 से पराजित किया था।

वांग ईहाँ से जीतने के बाद सेमीफाइनल में उनका मैच जापान की नोजोमी ओकुहरा से होना तय था, जिसमे सेमीफाइनल मैच में सिन्धु ने जबरदस्त खेल का प्रदर्शन करते हुए ओकुहरा को 0-2 से पराजित भी किया। इस तरह सिन्धु फाइनल तक पहुची और फाइनल में उनका मुकाबला वर्ल्ड नं. 1 खिलाडी से होना तय था और फाइनल में उनका मुकाबला स्पेनियार्ड कैरोलिना मरीन से होना तय हुआ। 83 मिनट तक चले उस मुकाबले में सिन्धु ने जबरदस्त खेल का प्रदर्शन किया लेकिन अंततः मरीन ने भी जबरदस्त वापसी करते हुए 2-1 से मुकाबले को अपने नाम किया। और सिन्धु को सिल्वर मेडल मिला। सिल्वर मेडल जीतते ही सिन्धु ने इतिहास रच दिया और ओलंपिक्स में भारत की तरफ से बैडमिंटन में सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली महिला बनी।

मैच के बाद सिंधु ने कहा कि “मुझे गर्व है कि मैं ओलंपिक में पदक जीत सकी। हां, स्वर्ण इससे काफी बेहतर होता, लेकिन मैं अच्छा खेली।” उन्होंने कहा कि शुरुआत में मैंने नहीं सोचा था कि मैं पदक जीत पाऊंगी, लेकिन जब मैं पदक की दौड़ में आयी तो मेरा लक्ष्य अच्छा खेलना था, जोकि मैंने किया। मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ खेल खेला। रिओ ओलंपिक्स में मेडल के लिये पुरे देश की उम्मीद को उन्होंने सिल्वर मेडल जीतकर पूरा किया। देश को हमेशा उनपर गर्व रहेंगा।

स्पोर्ट्स डेस्क दीपा दत्ता

Written by Deepak Chauhan

Deepak Chauhan is a journalist who expertise is writing digital News on Sports & Political , inspirational stories , having 5+ Year experience as a News Article writer,

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