
1500 मीटर की रेस… 1200 मीटर तक उसका नामोनिशान तक नहीं…. चीन और जापान की उड़नपरियां हवा से बातें करती हुईं… उन्हें फर्राटा भरते देख किसी को उसकी जीत उम्मीद नहीं थी…. लेकिन तभी किसी बॉलीवुड फिल्म की कहानी की तरह भुवनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम पर वो चैम्पियन बनकर उभरी ।
अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए उसने चीनी और जापानी स्प्रिन्टरों से लोहा लेना शुरू किया और देखते ही देखते आखिरी के 300 मीटर की रेस को पूरी तरह से अपना बना लिया। कमाल की बात है कि एक एक कर अपने सभी प्रतिद्वन्दियों को पीछे छोड़ते हुए जब वो फिनिश लाइन पर पहुंची तो उसके आस-पास भी कोई नहीं था। ये देखकर वो कमेंटेटर आवाक थे जिन्होंने शुरुआती 2.30 मिनट की कमेंट्री में उसका नाम तक नहीं लिया था तो एथलेटिक्स फेडरेशन के वो कार्यकर्ता दंग, जिन्हें उसकी जीत का भरोसा नहीं था। कुल मिलाकर ये उस दिन स्टेडियम में मौजूद दर्शकों को रोमांचित कर देने वाली जीत थी। और ये जीत थी पीटी उषा की तरह केरल से ही आने वाली एक और उड़नपरी पीयू चित्रा की, जिसे 22वें एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में गोल्डन दौड़ लगाने के लिए ‘क्वीन ऑफ एशिया इन द माइल’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। हालांकि, केरल की छोरी चित्रा के लिए एक आम स्प्रिन्टर से क्वीन ऑफ एशिया का सफर आसान नहीं था। और, इसकी वजह है वो पृष्ठभूमि जिससे वो आती है।
दरअसल, इंटरनेशनल ट्रैक पर दौड़ने के लिए जिन बुनियादी सुविधाओं और खान-पान की जरुरत होती है, चित्रा का परिवार उसे जुटा पाने में सक्षम नहीं था। केरल के पलक्काड़ जिले के मुंडूर गांव में 9 जून 1995 को जन्मी चित्रा के माता-पिता खेतीहर मजदूर हैं। घर के खर्चे जुटाने के लिए उन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे में चित्रा के लिए वे खेल की सुविधाएं कहां से जुटा पाते। लेकिन कहते हैं न कि, कोशिशें भी उन्हीं की रंग लाती हैं जो अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार होते हैं। केरल की फ्लाइंग क्वीन चित्रा के साथ भी कुछ ऐसा ही था। आर्थिक तंगी की वजह से कई रातें वो भूखे पेट सोई, लेकिन इन मुश्किल हालातों में भी सुबह जगकर उसने एनएस सिजिन की फिजिकल क्लास जाना नहीं छोड़ा, जिन्होंने अपनी देखरेख में पिछले 10 सालों में चित्रा की प्रतिभा को इस कदर निखारा की वो एशिया की चैम्पियन बन गई । लेकिन जिस तरह केरल की क्वीन चित्रा एशिया की चैम्पियन बनीं उस तरह से उसका वर्ल्ड एथलेटिक्स चैम्पियनशिप जीतने का सपना पूरा नहीं हो सका।
क्योंकि, भारतीय एथलेटिक्स फेडरेशन की लालफीताशाही की वजह से वो इसमें हिस्सा नहीं ले सकी थी। बहरहाल, खेल संघों का शिकार हुई चित्रा को इंतजार है केरल सरकार से अब एक नौकरी मिलने का, ताकि मां-बाप का हाथ बंटाकर वो अपने परिवार की आर्थिक तंगी को दूर कर सके।
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