मुस्कुराता चेहरा, सिकन का हावभाव नहीं, मैच के प्रेशर की तो बात ही मत कीजिए क्योंकि वो जब अपना गेम खेलती
है तो उसकी नजर सिर्फ बुल्स आई को हिट करने पर होती है ना कि स्कोर बोर्ड पर। वो पूर्व वर्ल्ड चैम्पियन है और फिलहाल दुनिया के टॉप -5 महिला तीरंदाजों में शुमार है। भारत की इस सर्वश्रेष्ठ महिला तीरंदाज का नाम है दीपिका कुमारी ।
दीपिका की कहानी रांची से 15 किमी दूर झारखंड के छोटे से गांव रातू चाती की उस छोटी-सी लड़की से शुरू होती है जो आम के बगीचे में जाकर आम तोड़ने के लिए पत्थर मारा करती थी । खेल में आगे बढ़ने का फैसला तो उसने छोटी उम्र में ही ले लिया था, लेकिन उस फैसले को सफलता का चोला पहनाते हुए वो पूरी दुनिया में अपना अलग मुकाम बना लेगी, इसका अंदाजा शायद ही किसी को था।
दीपिका के पिता शिवनारायण महतो ऑटोरिक्शा चालक हैं, जिन्होंने अपनी सीमित आमदनी के बावजूद दीपिका को भरपूर प्रोत्साहन दिया। 2005 में उन्होंने एक मोटरसाइकिल उधार र्फ इसलिए ली ताकि दीपिका को उस पर बिठाकर खरसावा के अर्जुन आर्चरी एकेडमी में अभ्यास के लिए ले जाया करें। उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में जब दीपिका ने गोल्ड मेडल जीता और सबकी जुबान पर उनका नाम छा गया । भारतीय तीरंदाजी का नया सितारा बन चुकी दीपिका लेकिन यही नहीं थमी।
दीपिका ने 2010 में ही तुर्की के अंताल्या में हुए वर्ल्ड कप फाइनल में 2004 की एथेंस ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता ली सुंग जिन को हराया । इस जीत ने दीपिका को ना सिर्फ दीपिका कॉमनवेल्थ चैम्पियन से वर्ल्ड चैम्पियन दिया बल्कि दुनिया की नंबर वन तीरंदाज का तमगा भी दिला दिया। हालांकि, ये मुमकिन ना होता अगर इन सबके पीछे उनकी कड़ी मेहनत, लगन और गजब की इच्छाशक्ति ना होती । दीपिका ने वर्ल्ड चैम्पियन बनने के लिए जमशेदपुर की टाटा आर्चरी एकेडमी में पूर्णिमा महतो के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण हासिल किया , जहां वो रोज आठ घंटे अभ्यास किया करती थीं। तपती धूप में वो खुद को तपाती थी ताकि देश के लिए सोना जीत सकें।
दीपिका को तीरंदाजी में उनकी शानदार कामयाबी के लिए साल 2012 में खेल के दूसरे बड़े पुरस्कार अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। साल 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा। कॉमनवेल्थ, एशियाई गेम्स और वर्ल्ड चैम्पियनशिप में सुनहरी जीत दर्ज कर चुकी दीपिका के सामने अब बस एक चुनौती है और वो है ओलंपिक में सोना जीतने की। लंदन और रियो में क्वालिफाई करने के बावजूद उन्हें इसमें सफलता नहीं मिल सकी है। लेकिन, उम्मीद है कि 2020 के ओलंपिक में उनका ये इंतजार खत्म हो जाएगा।
स्पोर्ट्स डेस्क प्रीती शर्मा

