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पत्थर तोड़ने पर मजबूर भारत मे हॉकी का हुनर

हमारे भारत देश की अगर खेल की उपलब्धियों की चर्चा की जाए तो सिर्फ नांममात्र की  उपलब्धियाँ हमारे खेल जगत के पिटारे में है।  लेकिन खेल उपलब्धियों का कम होना यह नहीं दर्शाता की की हमारे देश में प्रतिभाओ की कमी है।  हैरानी तो इस बात से है की हमारी सरकार और हम यह सब जानते हुए भी इन बातो को नजरअंदाज करते है और ओलम्पिक और एशियाई खेलो में खिलाड़ियों के बेहतर प्रदर्शन न होने पर सिस्टम को और  खिलाड़ियों को कोसते है।  दूसरी तरफ अगर कोई खिलाड़ी अपने अथक परिश्रम के बाद एशियाई , ओलम्पिक , इंटरनेशनल खेलो में अपना बेहतर प्रदर्शन कर दे तो  यह भ्रष्ट सिस्टम उन खिलाड़ियों तो प्रोत्साहन तो दूर की बार उनकी खबर तक नहीं लेता।

अगर देश की युवाओ में प्रतिभाओ को स्वस्थ  और भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण में तैयार किया जाए और चयन की  उचित प्रक्रिया अपनाई जाए तो हम विश्व के खेल के धरातल पर प्रथम स्थान पर होंगे।

आज हम बात करेंगे झारखंड के पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी गोपाल बेंग्रा जी की।  जिन्होंने लगातार 5 साल भारतीय हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया था।  तोरपा प्रखंड के उयुर में रहने वाले गोपाल बेंग्रा ने जिंदगी में बड़े उतार-चढ़ाव देखे। 1975-85 के दौर में जब वे देश के लिए खेलते थे। तब उन्हें बड़ी वाह वाही मिलती थी। कहीं बाहर निकलने पर सैकड़ों लोग उन्हें देखने के लिए जमा हो जाते थे। स्टार जैसा रुतबा था। गोपाल बेंग्रा जी पश्चिम बंगाल स्टेट टीम के कप्तान थे। शारीरिक कारणों से 1986 में उन्होंने हॉकी खेलना छोड़ दिया। जिससे वो वापिस अपने गांव लौट आये। इसके साथ ही उनका बुरा दौर शुरू हो गया। वह सेना में भी थे पर किसी कारण से उन्हें पेंशन नहीं मिली। गोपाल बच्चों का पेट भरने के लिए पत्थर तोड़ने का काम करने लगे। चुरगी टोंगरी में वे कड़ी धूप में दिनभर पत्थर तोड़ने का काम करते। मजदूरी के रूप में 80-100 रुपये मिलते थे। साथ में खेतीबारी कर किसी प्रकार परिवार का भरण-पोषण होता था। दुर्गापुर में कुछ दिनों तक उन्होंने सुरक्षा गार्ड का काम किया।

1999 में एक मगज़ीन ने गोपाल बेंग्रा की आर्थिक बदहाली की खबर छापी थी। की वह उस समय जीविका के लिए पत्थर तोड़ रहे है । सुनील गावस्कर जी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने गोपाल जी की मदद करने का फैसला लिया। खबर पढ़ने के बाद  सुनील गावस्कर ने 5 हजार हर महीने गोपाल बेंग्रा को भेजना शुरू किया। बाद में गावस्कर की कंपनी ने यह राशि  बढ़ा कर साढ़े सात हजार कर दी।जो अभी भी महींने की 3 तारीख को उनके बैंक खाते में पहुँच रही है।  सुनील गावस्कर पिछले 17 सालो से गोपाल बेंग्रा की आर्थिक मदद कर रहे है।

तोरपा स्थित अपने गांव में गोपाल बेंग्रा जी ने बताया कि सचमुच सुनील गावस्कर जी  मेरे लिए मसीहा हैं।

गोपाल बेंग्रा जैसे खिलाड़ी की ऐसी दुर्दशा वाकई ही हमारे देश के भ्रष्ट सिस्टम का जीवंत उदाहरण है। अगर ऐसा ही होता रहा तो देश से खेल में अंतराष्टीय स्तर पर पदको को लाना सिर्फ सपना ही रह जाएगा।

देखा जाए तो राजनीति खेल पर हावी रहती है राजनीति व्यक्ति खेलों में उच्चस्थ पदों पर आसीन रहते हैं और खेलों को प्रभावित करते हैं प्रतिभावान खिलाडि़यों को आगे लाने की बजाए भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाया जाता है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। खेलों को किसी न किसी रूप में राजनीति की छत्र – छाया में ही बढ़ना होता है दूसरी और राजनीति भी कई पायदानों को चढ़ खेल के रूप में विकसित होती नजर आ रही है।

चलते रहने का नाम जिंदगी है कुछ खिलाडि़यों ने खेल का अपमान किया लेकिन कई प्रतिभावान खिलाड़ी जो अभावों में जी रहे हैं लेकिन मेहनत कर रहे हैं खेल संघो  को चाहिए ऐसी प्रतिभाओं को आगे लाए। खेलों में भ्रष्टाचार हो सकता है इससे इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन उसे रोका भी जा सकता है इससे भी इंकार नहीं किया जाना चाहिए जरूरत सिर्फ व्यवस्था को समझने और कानून बनाने की है।

Written by Deepak Chauhan

Deepak Chauhan is a journalist who expertise is writing digital News on Sports & Political , inspirational stories , having 5+ Year experience as a News Article writer,

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