“मिलेगी परिंदों को मंजिल ये उनके पर बोलते हैं ,
रहते हैं कुछ लोग खामोश लेकिन उनके हुनर बोलते हैं| “
आज ” गुमनाम हुनर ” में फिर एक बार हम लेकर आए है गुम हो गए ऐसे हुनर के बारे में जिसने इस देश पर ही तिरंगे की शान नहीं बढ़ाई बल्कि एथेंस स्पेशल ओलंपिक में भी दो बार कांस्य पदक को अपने नाम किया। पर किस तरह परिस्थितियों ने इस हुनर को अपने ही देश में गुमनाम कर दिया । क्यों इस देश ने ओलम्पिक स्पेशल में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराने वाले हुनर को गुमनांम कर दिया।
मध्यप्रदेश के रीवा जिले के 15 वर्षीय ओलंपियन को वित्तीय परेशानियों के कारण गोलगप्पे बेचना पड़ रहा हैं | एथलीट की मां किरण साहू ने कहा, मै अपने बच्चों को एक गिलास दूध देने में भी असमर्थ हु। मुझे तो यह भी याद नहीं की आखरी बार मेरे परिवार ने पूरा भोजन कब किया था । गरीबी की वजह से मैंने अपने घर के पालतू कुत्तो को भी बेच दिया । क्योंकि मेरे पति शारीरिक तौर पर काम करने नौकरी पर नहीं जा सकते है। आज गोलगप्पो को बेचना ही हमारी आय का एकमात्र स्रोत है और पिछले कई सालों से हमारा जीवन इसी तरह से चल रहा है।
सीता साहू के द्वारा जीता गया 200 मीटर रिले दौड़ में कांस्य पदक और दूसरा, 1,600 मीटर की दौड़ में, उसके छह लोगों के परिवार को सहायता करने के लिए पर्याप्त नहीं था। और गोलगप्पे बेच कर की औसत पर परिवार रोजाना 150-180 रुपये या इससे भी कम कमाता है।
सीता के पदक से सम्मानित होने के बाद सीता के भाई धर्मेंद्र ने सामाजिक न्याय मंत्री गोपाल भार्गव से संपर्क किया था। “मंत्री ने घोषणा की थी कि जीतने वाले स्वर्ण पदक को 1 लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाएगा, रजत पदक विजेता को 50,000 रुपये मिलेगा, जबकि कांस्य विजेता को 25,000 रुपये मिलेंगे,” धर्मेंद्र ने दावा किया, “सरकार अपने वादे को पूरा करने में विफल रही।
सरकार ने घोषणा के बाद भी विजेता खिलाड़ी सीता साहू को कोई रकम नहीं दी। आज अपने परिवार के साथ बेहद ही तंग जिंदगी जी रही सीता साहू की हुनर ने दम तोड़ दिया। इसके लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाए। इस देश के स्वार्थी नेताओ को या फिर उसकी परिस्थितियों को। सीता साहू जैसी बेहद ही काबिल खिलाडी ने महज 15 साल की उम्र में ओलम्पिक में दो पदक हासिल किये। अगर सीता साहू को थोड़ी सरकार की तरफ से थोड़ी सी आर्थिक सहायता दी जाती तो आज ओलम्पिक में भारत देश स्वर्ण पदक का दावेदार होता। क्यों सरकार के द्वारा स्वार्र्थी रवैये ने हमारे देश को उसकी गरीबी में गुमनाम कर दिया अगर ऐसा ही हाल रहा तो हमारे देश के खिलाडी देश के प्रति खेलने से डरने लगेंगे। क्योकि इस देश को जितने विजेता पदको की अवश्यकता है उतना ही खिलाड़ियों को अपना परिवार भी जरुरी है।


